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रात के ३ बजे दरवाज़ा खटखटाया — और वह "कोई" तुम्हारे अंदर था

by merryecho360227 viewsHindi1:0312d ago

रात के ३ बजे दरवाज़ा खटखटाया — और वह "कोई" तुम्हारे अंदर था

रात के तीन बजे खटखटाहट सुनकर डर लगता है — पर असली डर तो वह है जो तुम्हारे भीतर छुपा है। जंगल की चींटी की तरह, जिसे एक फफूंद अपनी मर्ज़ी से नचाती है, क्या हम भी उतने ही बेबस हैं? तुम्हारे शरीर में अभी अड़तीस लाख करोड़ बैक्टीरिया हैं। कैंडिडा ऑरिस जैसी अजेय फफूंद इंतज़ार में है। और ब्रह्मांड के केंद्र में बैठा विशालकाय कृष्ण विवर — सैजिटेरियस ए — चालीस लाख सूर्यों के भार से सब कुछ निगलता जा रहा है। सबसे बड़ा डर भूत नहीं, अँधेरा नहीं — सबसे बड़ा डर यह है कि जो तुम्हें डरा रहा है, वह हमेशा से तुम्हारे अंदर था।

Transcript

रात के तीन बजे थे — और कुछ दरवाज़ा खटखटा रहा था। आपने सोचा, शायद हवा है। शायद कोई सपना है। पर नहीं। जंगल की उस चींटी को याद करो — जो अचानक ऊँचे पत्ते पर चढ़ने लगती है, बिना किसी कारण के। उसके दिमाग़ में Ophiocordyceps फफूंद घर कर चुकी होती है — वही उसे चलाती है, वही उसे मारती है। अब ज़रा रुको। तुम्हारे अपने शरीर में इस वक्त अड़तीस लाख करोड़ बैक्टीरिया हैं। तुम्हारी हर कोशिका के पीछे एक अजनबी खड़ा है। कैंडिडा ऑरिस — नब्बे प्रतिशत दवाओं से अजेय — शायद वहीं है, इंतज़ार में। Sagittarius A आकाशगंगा के बीचोबीच बैठा है। चालीस लाख सूर्यों का भार। वह खींचता है, निगलता है — उसके पास पहुँचो तो शरीर धागे की तरह खिंच जाता है, एक-एक परमाणु अलग होता चला जाता है। दरवाज़ा अब भी खटखटा रहा है। सबसे बड़ा डर यह नहीं कि अँधेरे में कोई है — सबसे बड़ा डर यह है कि वह कोई, तुम्हारे भीतर है। और हमेशा से था।

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